
अजीत मिश्रा (खोजी)
🔥 महंत जी जनसुनवाई का एक और शानदार प्रदर्शन 🔥
🚨जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज गंभीर शिकायत को पुलिस ने “गाली-गलौज” बता किया निस्तारित🚨
।। प्रभावशाली जिला पंचायत सदस्य साधुराम वर्मा पर आरोप — चुनावी शपथपत्र में आपराधिक मुकदमे छिपाने का मामला दबाया गया।।
अंबेडकरनगर।
जनसुनवाई पोर्टल (IGRS) पर दर्ज शिकायतों के निस्तारण को लेकर पुलिस की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। मामला जिला पंचायत सदस्य साधुराम वर्मा से जुड़ा है, जिन पर चुनाव के दौरान दिए गए शपथपत्र में आपराधिक मुकदमों को छिपाने का गंभीर आरोप लगाया गया था।
🔥 शिकायत पर कार्रवाई के बजाय “गाली-गलौज” का ठप्पा।
शिकायतकर्ता ने पहले कोतवाली टांडा में तहरीर दी थी और पुलिस द्वारा कार्रवाई न किए जाने पर मामला जनसुनवाई पोर्टल पर दर्ज कराया।
जांच कर रहे उप-निरीक्षक अर्जुन कुमार ने अपनी रिपोर्ट में पूरे प्रकरण को “गाली-गलौज का विवाद” बताकर निस्तारित कर दिया।
रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि “वादी को थाना बुलाया गया था, लेकिन वह नहीं आया” — जबकि शिकायतकर्ता का दावा है कि वह स्वयं CO कार्यालय तक बुलाए जाने पर भी उपस्थित हुआ था।
💫 सबूत के रूप में मौजूद फोटो और वीडियो गायब।
शिकायतकर्ता ने बताया कि उसने कोतवाली परिसर और जांच प्रक्रिया के फोटो व वीडियो पहले से बना रखे थे ताकि कोई हेरफेर न हो सके।
फिर भी, रिपोर्ट में फोटो संलग्न बताए गए, जबकि वास्तव में एक भी फोटो रिपोर्ट के साथ नहीं जोड़े गए।
पुलिस ने जिम्मेदारी टाल दी — “निर्वाचन अधिकारी से संपर्क करें”
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि “मामला जिला निर्वाचन अधिकारी से संबंधित है, अतः उनसे संपर्क किया जाए।”इस पर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है — उनका कहना है कि जब शिकायत आपराधिक कृत्य से जुड़ी है, तो मुकदमा लिखना पुलिस का ही दायित्व है, न कि निर्वाचन अधिकारी का।
💫 जनता का फूटा गुस्सा—
ग्रामीणों ने कहा कि अंबेडकरनगर में पुलिस अब प्रभावशालियों की ढाल बन चुकी है।“गरीब की शिकायत का मज़ाक बनाया जा रहा है, न्याय अब ताकतवरों की जेब में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रामराज्य की बात करते हैं, लेकिन अंबेडकरनगर में तो पुलिस अपना ही राग अलाप रही है। यहां ‘रामराज’ नहीं, ‘रावणराज’ जैसा माहौल बन गया है,” — ऐसा कहना है स्थानीय लोगों का।
💫 जनता की मांग:
🔥 मामले की निष्पक्ष जांच किसी बाहरी एजेंसी से कराई जाए।
🔥 संबंधित पुलिस अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई हो।
🔥 IGRS प्रणाली की जवाबदेही तय की जाए।











